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निर्वाण षट्कम्

जब आदि गुरु शंकराचार्य जी की अपने गुरु से प्रथम भेंट हुई तो उनके गुरु ने बालक शंकर से उनका परिचय माँगा। बालक शंकर ने अपना परिचय जिस रूप में दिया, वह 'निर्वाण-षटकम्' के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

श्लोक 1

मनो बुद्ध्यहंकार चित्तानि नाहं
न च श्रोत्र जिह्वे न च घ्राण नेत्रे।
न च व्योम भूमिर्न तेजो न वायु:
चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम् ॥

मैं मन, बुद्धि, अहंकार और स्मृति नहीं हूँ। न मैं कान, जीभ, नाक और आँख हूँ। न मैं आकाश, पृथ्वी, अग्नि या वायु हूँ। मैं चैतन्य और आनंद स्वरूप हूँ — शिव हूँ।

I am not mind, intellect, ego, or memory. I am not the senses. I am beyond elements. I am pure consciousness and bliss — Shivoham.

श्लोक 2

न च प्राणसंज्ञो न वै पञ्चवायुः
न वा सप्तधातुर्न वा पञ्चकोशः।
न वाक्पाणिपादौ न चोपस्थपायु:
चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम् ॥

न मैं प्राण हूँ, न पंच वायु, न सात धातुएँ, न पंच कोश। न मैं वाणी, हाथ, पैर या शरीर के अंग हूँ — मैं शिव हूँ।

I am not energy, breath, body elements, or coverings. I am beyond actions and organs. I am pure consciousness.

श्लोक 3

न मे द्वेषरागौ न मे लोभमोहो
मदो नैव मे नैव मात्सर्यभावः।
न धर्मो न चार्थो न कामो न मोक्षः
चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम् ॥

न मुझमें राग-द्वेष, लोभ-मोह या अहंकार है। न धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष — मैं इन सबसे परे हूँ।

No hatred, no desire, no greed, no ego. I am beyond all goals of life — I am pure bliss.

श्लोक 4

न पुण्यं न पापं न सौख्यं न दुःखं
न मंत्रो न तीर्थं न वेदा न यज्ञः।
अहं भोजनं नैव भोज्यं न भोक्ता
चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम् ॥

न मैं पुण्य हूँ, न पाप, न सुख, न दुःख। न मंत्र, न तीर्थ, न वेद — मैं इन सबसे परे हूँ।

No virtue, no sin, no pleasure or pain. I am not rituals — I am pure awareness.

श्लोक 5

न मे मृत्युशंका न मे जातिभेदः
पिता नैव मे नैव माता न जन्म।
न बन्धुर्न मित्रं गुरुर्नैव शिष्यः
चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम् ॥

न मुझे मृत्यु का भय है, न जाति का भेद। न मेरा जन्म है, न माता-पिता — मैं शुद्ध आत्मा हूँ।

No fear of death, no identity, no relations. I am eternal consciousness — beyond birth.

श्लोक 6

अहं निर्विकल्पो निराकार रूपो
विभुत्वाच्च सर्वत्र सर्वेन्द्रियाणाम्।
न चासंगतं नैव मुक्तिर्न बन्धः
चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम् ॥

मैं निराकार, सर्वव्यापक हूँ। न बंधन है, न मुक्ति — मैं सदा एक समान हूँ।

I am formless, everywhere, beyond bondage and freedom. I am eternal bliss — Shivoham.